नई दिल्ली. सरकार उर्वरक सब्सिडी के बोझ को कम करने के लिए यूरिया बिक्री को डिजिटल किसान आईडी से जोड़ेगी। पहले चरण में 7 जिलों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू होगा।
देश के करोड़ों किसानों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है। अगर आप खेती करते हैं और यूरिया का इस्तेमाल करते हैं तो यह जानकारी आपके लिए बेहद काम की है। केंद्र सरकार अब उर्वरक यानी खाद की बिक्री व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करने की योजना बना रही है।
इसके तहत यूरिया की खरीद को अब ‘डिजिटल किसान पहचान पत्र’ (Farmer ID) से जोड़ा जाएगा। सरकार का यह कदम खाद सब्सिडी के बढ़ते बोझ को कम करने और यूरिया के सही इस्तेमाल को सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया जा रहा है।
सब्सिडी और सरकार की चिंता
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती खाद पर दी जाने वाली भारी भरकम सब्सिडी है। वित्त वर्ष 2025 और 26 में सरकार ने उर्वरक सब्सिडी के लिए 1.68 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा था। लेकिन असल में यह खर्च अनुमान से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। आंकड़ों के मुताबिक यह खर्च 1.91 लाख करोड़ रुपये के पार जाने की आशंका है।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच देश में यूरिया की खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची है। इस दौरान करीब 3.11 करोड़ टन यूरिया इस्तेमाल किया गया जो पिछले साल के मुकाबले 4 फीसदी ज्यादा है। इसी अनियंत्रित खर्च को रोकने के लिए सरकार अब तकनीक का सहारा ले रही है।
कैसे काम करेगा नया सिस्टम
कृषि मंत्रालय ने इस नई व्यवस्था का खाका तैयार कर लिया है। इसे ‘एग्री स्टैक’ (AgriStack) पहल के साथ जोड़ा जा रहा है। योजना के मुताबिक यूरिया की बिक्री केवल उन्हीं लोगों को की जाएगी जिनके पास डिजिटल फार्मर आईडी होगी। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सस्ता यूरिया केवल असली किसान और जमीन के मालिक तक ही पहुंचे।
दो चरणों में लागू होगा नियम
सूत्रों के हवाले से खबर है कि इस बदलाव को एकदम से पूरे देश में लागू नहीं किया जाएगा बल्कि इसे चरणबद्ध तरीके से अपनाया जाएगा।
पहला चरण (पायलट प्रोजेक्ट): शुरुआत में इसे देश के चुनिंदा 7 जिलों में लागू किया जा सकता है। इन जिलों में पहले से ही बड़ी संख्या में किसानों की डिजिटल आईडी बनी हुई है। इस चरण में खाद की बिक्री पर रोक नहीं लगाई जाएगी। अगर कोई किसान जरूरत से ज्यादा खाद खरीदेगा तो सिस्टम उसे सिर्फ एक डिजिटल चेतावनी देगा और सही मात्रा के बारे में सलाह देगा।
दूसरा चरण (लिमिट तय करना): जब यह प्रयोग सफल होगा तो इसे अन्य राज्यों में फैलाया जाएगा। दूसरे चरण में सरकार कड़े कदम उठा सकती है। इसमें किसान की जमीन के आकार और फसल के प्रकार के आधार पर खाद की एक अधिकतम सीमा तय कर दी जाएगी। यह सीमा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के मानकों पर आधारित होगी।
7 करोड़ से ज्यादा किसानों की डिजिटल आईडी तैयार
सरकार का मिशन है कि हर किसान के पास अपनी एक डिजिटल पहचान हो। सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो दिसंबर 2025 तक देश में करीब 7.67 करोड़ किसानों की डिजिटल आईडी बनाई जा चुकी है। इस आईडी में किसान की जमीन का पूरा ब्योरा और वो कौन सी फसल उगाता है इसकी जानकारी दर्ज होती है।
सरकार ने डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत साल 2027 तक 11 करोड़ किसानों को इस सिस्टम से जोड़ने का लक्ष्य रखा है। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को निर्देश दिए हैं कि वे जल्द से जल्द अपने यहां किसानों की आईडी बनाने का काम पूरा करें और जमीनों का डिजिटल सर्वे करें।
क्या होगा इसका फायदा?
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम खेती के भविष्य के लिए अच्छा साबित हो सकता है। फिलहाल यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल मिट्टी की सेहत को खराब कर रहा है।
नई व्यवस्था से न केवल मिट्टी बचेगी बल्कि यूरिया की कालाबाजारी पर भी लगाम लगेगी। अक्सर देखा जाता है कि खेती का यूरिया फैक्ट्रियों और उद्योगों में अवैध रूप से पहुंच जाता है जिसे रोकना इस डिजिटल सिस्टम से आसान हो जाएगा।













