हिसार. रबी सीजन की प्रमुख फसल गेहूं अब अपनी बढ़त की अवस्था में है। इस समय हर किसान की यही चाहत होती है कि उसकी फसल में बालियां लंबी आएं और उनमें दानों की संख्या ज्यादा हो।
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि फसल की ‘गाभा अवस्था’ यानी जब बाली तने के अंदर बन रही होती है तब उसे विशेष पोषण की जरूरत होती है। यदि इस समय सही खाद और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का छिड़काव कर दिया जाए तो पैदावार में 15 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
पोटाश और फॉस्फोरस का विज्ञान
पौधों के विकास के लिए यूं तो कई पोषक तत्व जरूरी हैं लेकिन जब बात दाने भरने और बाली की लंबाई की हो तो फॉस्फोरस और पोटाश की भूमिका सबसे अहम हो जाती है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार फॉस्फोरस जड़ों को मजबूत करता है और पोटाश दानों में चमक और वजन बढ़ाता है। इन दोनों की कमी को पूरा करने के लिए एनपीके (NPK) खाद सबसे सस्ता और प्रभावी विकल्प है। यह पानी में घुलनशील होता है और पत्तियों के जरिए पौधे इसे जल्दी अवशोषित कर लेते हैं।
बोरॉन है छोटा पैकेट बड़ा धमाका
अक्सर किसान एनपीके तो डाल देते हैं लेकिन बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व को नजरअंदाज कर देते हैं। वनस्पति विज्ञान के अनुसार बोरॉन का मुख्य काम ‘परागण’ यानी पोलिनेशन की प्रक्रिया को सुचारू बनाना है।
यदि पौधे में बोरॉन की कमी होगी तो परागण सही से नहीं होगा जिससे बाली में दाने कम बनेंगे या बाली खाली रह जाएगी। इसलिए कृषि वैज्ञानिक एनपीके के साथ बोरॉन मिलाकर छिड़कने की सलाह देते हैं। यह फूलों को झड़ने से रोकता है और हर फूल को दाने में बदलने में मदद करता है।
लिहोसिन और टैबूकोनाजोल का सही गणित
फसल की अनचाही बढ़त को रोकने और ऊर्जा को बाली की तरफ मोड़ने के लिए ‘लिहोसिन’ का प्रयोग किया जाता है। वहीं फंगस और रतुआ जैसे रोगों से बचाने के लिए ‘टैबूकोनाजोल’ नामक फंगीसाइड का उपयोग होता है।
सही मात्रा का ज्ञान होना जरूरी है:
लिहोसिन: 100 लीटर पानी में 200 मिलीलीटर।
टैबूकोनाजोल: 100 लीटर पानी में 100 मिलीलीटर (0.1 प्रतिशत सांद्रता)।
एनपीके: एक एकड़ के लिए 1 किलोग्राम।
बोरॉन: एक एकड़ के लिए 100 ग्राम।
यदि आप एक एकड़ में 150 लीटर पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं तो एनपीके की मात्रा बढ़ाकर डेढ़ किलो कर दें। याद रखें कि पानी की मात्रा के हिसाब से ही दवा का अनुपात रखना चाहिए।
घोल बनाते समय सावधानी है जरूरी
इन सभी तत्वों का एक साथ स्प्रे करना समय और मजदूरी दोनों बचाता है लेकिन इसमें सावधानी बरतना बेहद आवश्यक है। कई बार अलग अलग रसायनों को मिलाने पर रासायनिक प्रतिक्रिया हो सकती है जिससे घोल फट सकता है।
जार टेस्ट जरूर करें
छिड़काव से पहले एक छोटे बर्तन या मग में थोड़ा थोड़ा रसायन और पानी मिलाकर देखें। अगर घोल फट जाए या बहुत ज्यादा गर्म या ठंडा हो जाए तो उसे टैंक में न डालें। ऐसा घोल फसल को जलाने का काम कर सकता है।
बोरॉन का प्रयोग सीमित मात्रा में ही करें क्योंकि इसकी अधिकता भी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है। सही विधि से किया गया यह स्प्रे आपकी मेहनत को सफल बनाएगा और मंडी में उपज का बेहतरीन दाम दिलाएगा।












