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Ahoi Ashtami 2025 पर Nuh में किस टाइम दिखेगा चांद? जानें अहोई अष्टमी पूजा विधि

On: October 10, 2025 8:25 PM
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Ahoi Ashtami 2025 पर Nuh में किस टाइम दिखेगा चांद? जानें अहोई अष्टमी पूजा विधि
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Ahoi Ashtami 2025 Nuh mein chand kab niklega: हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का व्रत माताओं और उनकी संतान के बीच के प्यार को समर्पित है। यह त्योहार माता अहोई की पूजा के लिए जाना जाता है, जिसमें माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र और सुख के लिए उपवास रखती हैं। यह पर्व दिवाली से लगभग आठ दिन पहले, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिणी राज्यों में अमांत कैलेंडर के अनुसार यह आश्विन मास में पड़ता है, लेकिन व्रत का दिन एक ही होता है। आइए जानते हैं अहोई अष्टमी 2025 की तारीख, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसकी कथा।

Ahoi Ashtami 2025 पर Nuh में किस टाइम दिखेगा चांद?

इस साल अहोई अष्टमी का व्रत 13 अक्टूबर 2025, सोमवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 13 अक्टूबर को दोपहर 12:24 बजे शुरू होगी और 14 अक्टूबर को सुबह 11:09 बजे खत्म होगी। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:17 बजे से 6:31 बजे तक रहेगा, जो कुल 1 घंटे 14 मिनट का होगा। तारों को अर्घ्य देने का समय शाम 5:40 बजे से शुरू होगा। कुछ परिवारों में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है, जिसके लिए चंद्रोदय रात 10:52 बजे होगा। इस दिन गोवर्धन और राधा कुंड स्नान का भी महत्व है।

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अहोई अष्टमी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा चंद्रभान के बच्चों की कम उम्र में मृत्यु हो गई थी। दुखी राजा और उनकी पत्नी ने कठोर तपस्या की और सब कुछ छोड़कर जंगल में चले गए। वहां बद्रिका आश्रम के पास एक तालाब के किनारे सात दिन बाद उन्हें एक आकाशवाणी सुनाई दी। आकाशवाणी ने बताया कि उनके पिछले जन्म के पापों के कारण यह दुख भोगना पड़ रहा है। उन्हें अहोई अष्टमी का व्रत रखने की सलाह दी गई। राजा और रानी ने श्रद्धा से व्रत रखा और माता अहोई की पूजा की। माता ने प्रसन्न होकर उन्हें संतान का आशीर्वाद दिया। माता ने रानी को एक शावक का चेहरा बनाकर अहोई भगवती की पूजा करने को कहा। उनकी भक्ति से उनके बच्चे जीवित हो गए। तब से यह व्रत अहोई आठे के नाम से भी जाना जाता है।

अहोई अष्टमी की पूजा विधि

अहोई अष्टमी के दिन माताएं सुबह जल्दी उठकर निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं। पूजा से एक दिन पहले पूजा स्थल को साफ किया जाता है। जो दंपत्ति संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, वे मथुरा के राधा कुंड में सूर्योदय के समय स्नान करते हैं और मां दुर्गा के कुशमांडा अवतार की पूजा करते हैं। पूजा में अहोई माता और शेर के शावक की अष्टकोणीय तस्वीर दीवार पर बनाई जाती है। इसके सामने पानी से भरा कलश और करवा रखा जाता है।

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माता की तस्वीर के बाईं ओर एक सजा हुआ कटोरा रखा जाता है, जिसके चारों ओर लाल धागा बांधा जाता है। कुमकुम, हल्दी और अक्षत चढ़ाए जाते हैं। हलवा, पूरी, गन्ना, सिंघाड़ा, ज्वार, चना, मिठाई और फल माता को भोग के रूप में चढ़ाए जाते हैं। संध्या समय पूजा शुरू होती है, जिसमें माता की आरती और व्रत कथा पढ़ी जाती है। घी का दीपक जलाया जाता है और बच्चों की लंबी उम्र के लिए संकल्प लिया जाता है। गंध, पुष्प, दीप, धूप और नैवेद्य माता को अर्पित किए जाते हैं।

व्रत का पारण सूर्यास्त के बाद तारों को देखकर या चंद्रमा को अर्घ्य देकर किया जाता है। बच्चे माताओं को पानी पिलाकर व्रत खोलने में मदद करते हैं। यह पर्व परिवार की एकता और मातृत्व के प्यार को दर्शाता है।

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अमित गुप्ता

पत्रकारिता में पिछले 30 वर्षों का अनुभव। दैनिक भास्कर, अमर उजाला में पत्रकारिता की। दैनिक भास्कर में 20 वर्षों तक काम किया। अब अपने न्यूज पोर्टल हरियाणा न्यूज पोस्ट (Haryananewspost.com) पर बतौर संपादक काम कर रहा हूं। खबरों के साथ साथ हरियाणा के हर विषय पर पकड़। हरियाणा के खेत खलियान से राजनीति की चौपाल तक, हरियाणा सरकार की नीतियों के साथ साथ शहर के विकास की बात हो या हर विषयवस्तु पर लिखने की धाकड़ पकड़। म्हारा हरियाणा, जय हरियाणा।

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