चंडीगढ़, 21 मई (हरियाणा न्यूज पोस्ट)। Heatwave Precautions: सुबह के ठीक साढ़े नौ बजे हैं। अमूमन इस वक्त शहरों में दफ्तर भागने की जल्दी होती है और बाजारों में शटर उठ रहे होते हैं। लेकिन दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा के रोहतक-हिसार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में नजारा कुछ और ही है। सड़कों पर सन्नाटा पसरने लगा है, जैसे किसी ने अघोषित कर्फ्यू लगा दिया हो। आसमान की तरफ देखिए तो सूरज की पीली रोशनी अब सफेद और तीखी हो चुकी है। यह मई-जून की वह चिरपरिचित, लेकिन इस बार बेहद क्रूर नजर आ रही गर्मी है, जिसने इंसानी शरीर को भट्टी में झोंकना शुरू कर दिया है।
मौसम विभाग की स्क्रीन पर लाल बत्तियां जल रही हैं। पारा 45 डिग्री सेल्सियस के जादुई और डरावने आंकड़े को पार कर चुका है। मौसम विशेषज्ञों ने साफ शब्दों में कह दिया है कि यह Heatwave तो सिर्फ शुरुआत है, अगले 10 दिनों तक इन गर्म हवाओं के थपेड़े यानी ‘लू’ का टॉर्चर अभी और बढ़ने वाला है। अस्पताल के ओपीडी वार्डों में अचानक भीड़ बढ़ गई है। कोई चक्कर खाकर गिरा है, तो किसी का शरीर पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस कर सूख चुका है। यह महज एक मौसम का बदलना नहीं है, यह एक सामूहिक स्वास्थ्य संकट है जो हमारे दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया है।
जब दोपहर के 5 घंटे बन जाते हैं ‘नो-गो ज़ोन’
एक पत्रकार के तौर पर जब आप इस धूप में सड़क पर उतरते हैं, तो सबसे पहले आपकी आंखों में जलन होती है और सांस लेते वक्त गर्म हवा फेफड़ों को झुलसाती है। डॉक्टरों ने बहुत सोच-समझकर एक टाइमलाइन तय की है सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक। यह दिन का वह हिस्सा है जिसे अब मेडिकल भाषा में ‘डेथ ज़ोन’ या ‘नो-गो ज़ोन’ कहा जा सकता है। इस दौरान सूरज की किरणें तिरछी नहीं, बल्कि सीधे हमारे सिर पर प्रहार करती हैं।
खिड़की से बाहर झांकिए, सबसे ज्यादा आफत में वो लोग हैं जिनके पास घर के अंदर बैठने का विकल्प नहीं है। डिलीवरी बॉयज, सिक्योरिटी गार्ड्स, रेहड़ी-पटरी वाले और सड़कों पर मजदूरी करने वाले लोग। डॉक्टरों का कहना है कि इस समय की धूप शरीर की नमी को वैसे ही सोख लेती है जैसे स्पंज पानी को सोखता है। अगर बहुत ज्यादा इमरजेंसी न हो, तो इस पांच घंटे के दौरान घर की चारदीवारी के अंदर रहना ही समझदारी है। फील्ड में काम करने वाले साथियों को सख्त हिदायत है कि हर आधे घंटे में छांव तलाशें, चाहे वह किसी पेड़ की हो या किसी ढहती हुई दीवार की।
104 डिग्री का थर्मामीटर और शरीर का फेल होता सिस्टम
आखिर लू लगने पर शरीर के भीतर ऐसा क्या होता है कि इंसान चंद घंटों में जिंदगी और मौत के बीच झूलने लगता है? इस विज्ञान को समझना बेहद जरूरी है। हमारा शरीर एक अद्भुत मशीन है, जो पसीना बहाकर खुद के तापमान को 37°C (98.6°F) पर मेंटेन रखती है। लेकिन जब बाहर का तापमान 45 डिग्री पार कर जाए और हवा सूखी हो, तो शरीर का यह कूलिंग सिस्टम यानी थर्मामीटर पूरी तरह क्रैश हो जाता है।
इसे मेडिकल की भाषा में ‘हीट एक्सॉशन’ से ‘हीट स्ट्रोक’ (Heatwave) की स्थिति कहा जाता है। इस हालत में शरीर का तापमान अचानक शूटर की तरह भागता है और 104°F या उससे भी ऊपर चला जाता है। जब दिमाग और अंदरूनी अंगों को इतनी भीषण गर्मी झेलनी पड़ती है, तो वे काम करना बंद करने लगते हैं। यह स्थिति जानलेवा साबित होती है। यही वजह है कि सफदरजंग से लेकर पीजीआई रोहतक तक के सीनियर डॉक्टर्स इस बार की गर्मी को हल्के में न लेने की बार-बार चेतावनी दे रहे हैं।
हमारा सदियों पुराना देसी कवच
इस हाई-टेक युग में जब आप किसी बड़े अस्पताल के डायरेक्टर से पूछते हैं कि साहब, इस जानलेवा लू से बचने का सबसे अचूक इलाज क्या है? तो वह मुस्कुराकर वही जवाब देते हैं जो कभी हमारी दादी-नानी दिया करती थीं। इस धूप से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार कोई महंगी दवा नहीं, बल्कि हमारा पारंपरिक ‘गमछा’ या सूती कपड़ा है।
जब आप धूप में निकलते हैं, तो सबसे पहले आपका सिर गर्म होता है। सिर का तापमान बढ़ते ही दिमाग की नसें प्रभावित होती हैं, जिससे चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा छाना और बेहोशी जैसी शिकायतें होती हैं। इसलिए घर की दहलीज लांघने से पहले सिर को गमछे, टोपी या स्कार्फ से अच्छी तरह ढंकना अनिवार्य है। छाता लेकर चलना कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि समझदारी की निशानी है। इसके साथ ही, सिंथेटिक कपड़ों को अलमारी में बंद कर दीजिए। केवल हल्के रंग के और ढीले-ढाले सूती कपड़े पहनें, ताकि शरीर की हवा आर-पार होती रहे।
सादे पानी का भ्रम और इलेक्ट्रोलाइट्स की असली जंग
अक्सर लोग सोचते हैं कि जेब में पानी की एक बोतल रख ली, तो वे महफूज़ हो गए। लेकिन डॉक्टरों की डायरी का एक पन्ना यहां गौर करने लायक है। Heatwave में जब लगातार पसीना बहता है, तो शरीर से सिर्फ पानी बाहर नहीं निकलता। पानी के साथ हमारे जिंदा रहने के लिए जरूरी मिनरल्स, खासकर सोडियम और पोटेशियम भी बह जाते हैं। जब शरीर में इन इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी होती है, तो सादा पानी पीने के बावजूद इंसान को कमजोरी और ऐंठन महसूस होने लगती है।
यहीं पर काम आते हैं हमारे भारतीय रसोई के पारंपरिक अमृत नींबू पानी, गाढ़ी छाछ, कच्ची केरी का पन्ना, बेल का शरबत और नारियल पानी। अगर आप काम के सिलसिले में बाहर हैं, तो जेब में पांच रुपये का ओआरएस (ORS) का पाउच जरूर रखिए। पानी में इसे घोलकर पीना आपके शरीर के भीतर मिनरल्स का संतुलन बनाए रखता है। याद रखिए, इस मौसम में चाय, कॉफी और कोल्ड ड्रिंक्स पीने से बचें, क्योंकि ये शरीर को हाइड्रेट करने के बजाय अंदरूनी तौर पर और सुखा देती हैं।
बीपी और दिल के मरीजों के लिए ‘रेड अलर्ट’
इस पूरी कहानी का सबसे संवेदनशील हिस्सा वो बुजुर्ग और मरीज हैं जो पहले से ही ब्लड प्रेशर (BP) या दिल की बीमारी से जूझ रहे हैं। गर्मी का यह क्रूर मौसम उनके लिए किसी दोहरी मार से कम नहीं है। अत्यधिक पसीना निकलने की वजह से खून गाढ़ा होने लगता है या फिर मिनरल्स असंतुलित होने से बीपी अचानक से बहुत नीचे गिर जाता है या अप्रत्याशित रूप से हाई हो जाता है।
कार्डियोलॉजिस्ट्स की साफ सलाह है कि जितने भी बीपी और हार्ट के मरीज हैं, वे अपनी दवाइयों के समय को लेकर रत्ती भर भी लापरवाही न बरतें। दोपहर के वक्त उनका बाहर निकलना पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए। अगर घर के किसी बुजुर्ग को अचानक घबराहट हो, सीने में भारीपन महसूस हो, बहुत ज्यादा कमजोरी लगे या हल्का सा भी चक्कर आए, तो इसे ‘सिर्फ गर्मी है’ कहकर टालने की भूल बिल्कुल न करें। तुरंत उन्हें नजदीकी डॉक्टर या अस्पताल लेकर जाएं, क्योंकि ऐसे मामलों में शुरुआती चंद मिनट ही जिंदगी बचाते हैं।
मौसम विभाग का अनुमान है कि अगले दस दिन Heatwave के कारण कठिन हैं, लेकिन सही जानकारी और थोड़ी सी सतर्कता से हम इस तपते हुए उत्तर भारत में खुद को और अपने परिवार को पूरी तरह सुरक्षित रख सकते हैं।
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