Agriculture News: India’s first genome-edited rice varieties launched: Yields will increase by 30% in many states including Haryana: भारतीय कृषि में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने 4 मई 2025 को भारत की पहली जीनोम-संपादित धान की किस्में—पूसा डीएसटी राइस 1 और डीआरआर धान 100 (कमला)—लॉन्च कीं।
ये किस्में सूखा-सहनशील, उच्च उपज देने वाली, और पर्यावरण-अनुकूल हैं, जो हरियाणा सहित कई राज्यों के किसानों के लिए वरदान साबित होंगी। आइए, इस क्रांतिकारी नवाचार की पूरी कहानी जानते हैं।
जीनोम संपादन: कृषि में नई क्रांति Agriculture News
कृषि क्षेत्र में भारत ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। नई दिल्ली के पूसा परिसर में आयोजित एक समारोह में केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इन जीनोम-संपादित धान की किस्मों को लॉन्च किया।
उन्होंने वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि की सराहना की और कहा कि यह नवाचार खाद्य सुरक्षा, जलवायु लचीलापन, और किसान कल्याण की दिशा में मील का पत्थर है। इन किस्मों को सीआरआईएसपीआर-कैस तकनीक से विकसित किया गया है, जो सूखा, लवणीयता, और कम उर्वरक की स्थिति में भी शानदार उपज देती हैं। यह तकनीक किसानों को बदलते मौसम और पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में मदद करेगी।
पूसा डीएसटी राइस 1: सूखा और नमक का जवाब
आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) ने पूसा डीएसटी राइस 1 को लोकप्रिय धान की किस्म ‘एमटीयू1010’ से उन्नत किया है। इस किस्म में डीएसटी जीन को संपादित कर इसे सूखा और लवणीय मिट्टी के प्रति सहनशील बनाया गया है।
फील्ड ट्रायल्स में इसने तनावग्रस्त परिस्थितियों में 10-30% अधिक उपज दी, जबकि दाने की गुणवत्ता बरकरार रही। यह किस्म खरीफ और रबी दोनों मौसमों के लिए उपयुक्त है और हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के लवणीय और क्षारीय क्षेत्रों में उगाई जा सकती है। यह किस्म किसानों को कम पानी और उर्वरक के साथ बेहतर उत्पादन का मौका देती है।
डीआरआर धान 100 (कमला): अधिक दाने, कम समय
आईसीएआर-भारतीय धान अनुसंधान संस्थान (हैदराबाद) द्वारा विकसित डीआरआर धान 100, जिसे ‘कमला’ नाम दिया गया है, ‘सांबा महसूरी’ का उन्नत संस्करण है।
इसमें सीकेक्स2 जीन को संपादित कर बालियों में दानों की संख्या बढ़ाई गई है। फील्ड ट्रायल्स में इसने 19% अधिक उपज दी, जो औसतन 53.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और अधिकतम 88.96 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक रही। यह किस्म सूखा-सहनशील है, केवल 130 दिनों में पकती है (20 दिन पहले), और कम नाइट्रोजन उर्वरक की जरूरत पड़ती है। इससे पानी की बचत, मीथेन उत्सर्जन में कमी, और अगली फसल के लिए खेत जल्दी खाली होने जैसे लाभ मिलते हैं।
पर्यावरण और किसानों के लिए वरदान
इन जीनोम-संपादित किस्मों में कोई विदेशी डीएनए नहीं है, जिससे ये पारंपरिक किस्मों की तरह सुरक्षित हैं। इन्हें पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत जैव-सुरक्षा छूट मिली है।
अगर इन किस्मों को 50 लाख हेक्टेयर में अपनाया जाए, तो 45 लाख टन अतिरिक्त धान उत्पादन और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20% की कमी संभव है। यह टिकाऊ खेती को बढ़ावा देगा और हरियाणा जैसे राज्यों में पर्यावरण-अनुकूल कृषि को नई दिशा देगा।
सरकार और वैज्ञानिकों का संकल्प
आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने इसे ऐतिहासिक दिन बताते हुए कहा कि यह नवाचार मांग-आधारित कृषि अनुसंधान की दिशा में बड़ा कदम है।
केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी, कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी, और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने इस उपलब्धि को सराहा। हरियाणा के किसानों के लिए यह योजना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ की जलवायु और मिट्टी इन किस्मों के लिए आदर्श है।
किसानों के लिए नई उम्मीद
यह जीनोम-संपादित धान की किस्में हरियाणा और अन्य राज्यों के किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई हैं। ये किस्में न केवल उनकी आय बढ़ाएंगी, बल्कि पर्यावरण को भी सुरक्षित रखेंगी।
अगर आप हरियाणा में किसान हैं, तो अपने नजदीकी कृषि केंद्र से इन किस्मों के बीज और खेती की जानकारी प्राप्त करें। आइए, इस नवाचार को अपनाकर भारत की खेती को और समृद्ध बनाएं













