नई दिल्ली. रबी सीजन की प्रमुख फसल गेहूं इस समय खेतों में लहलहा रही है। कड़ाके की ठंड और बदलते मौसम के बीच किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें भी हैं। अगर आप भी बंपर पैदावार की उम्मीद कर रहे हैं तो यह खबर आपके बहुत काम की है।
कानपुर स्थित चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (CSA) के वैज्ञानिकों ने किसानों को आगाह किया है। उनका कहना है कि गेहूं की फसल में पहली और दूसरी सिंचाई का समय ही यह तय करता है कि मुनाफा कितना होगा। थोड़ी सी लापरवाही आपकी महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है।
सीआरआई अवस्था का गणित समझना जरूरी
विश्वविद्यालय के शोध निदेशक डॉ आरके यादव ने बताया कि गेहूं की कुल पैदावार का 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ शुरुआती दो सिंचाइयों पर निर्भर करता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है पहली सिंचाई। वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘सीआरआई स्टेज’ यानी जड़ फुटान की अवस्था कहा जाता है।
यह अवस्था बुवाई के ठीक 20 से 21 दिन बाद आती है। यही वह समय होता है जब जमीन के अंदर पौधे की मुख्य जड़ें बन रही होती हैं। अगर इस नाजुक समय पर खेत में नमी की कमी रह जाए तो पौधे की नींव कमजोर रह जाती है और बाद में चाहे कितनी भी खाद डाल लें पौधा पूरा विकास नहीं कर पाता।
दूसरी सिंचाई में न करें देरी
डॉ यादव के अनुसार दूसरी सिंचाई भी उतनी ही अहम है जितनी पहली। बुवाई के 40 से 50 दिन बाद फसल को दूसरे पानी की जरूरत होती है। यह वह दौर होता है जब पौधे में कल्ले फूट रहे होते हैं और तने का विकास हो रहा होता है।
इस समय पौधे को मिट्टी से नाइट्रोजन खींचने के लिए पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है। अगर पानी समय पर न मिले तो नाइट्रोजन का अवशोषण रुक जाता है और फसल पीली पड़ने लगती है। पीलापन इस बात का संकेत है कि पौधा कुपोषण का शिकार हो रहा है।
बाढ़ नहीं क्यारी विधि है फायदेमंद
अक्सर किसान खेत में खुला पानी छोड़ देते हैं जिससे जलभराव हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तरीका गलत है। खेत में ज्यादा पानी भरने से जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और वे गलने लगती हैं।
सिंचाई के लिए ‘क्यारी विधि’ सबसे उत्तम मानी गई है। इससे पूरे खेत में एक समान पानी पहुंचता है। इसके अलावा जो किसान आधुनिक तकनीक अपनाना चाहते हैं वे ‘मिनी स्प्रिंकलर’ का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह कम पानी में फसल को भरपूर नमी देने का सबसे कारगर तरीका है।
खरपतवार और खाद का सही प्रबंधन
सिर्फ पानी ही नहीं बल्कि सही समय पर यूरिया और जिंक सल्फेट का प्रयोग भी जरूरी है। गेहूं के खेत में अक्सर चौड़ी और सकरी पत्ती वाले खरपतवार उग आते हैं जो फसल का पोषण खा जाते हैं।
इनसे निपटने के लिए डॉ यादव ने मेटासल्फ्यूरान और सल्फोसल्फ्यरान रसायन की सलाह दी है। इसके 16 ग्राम के पैकेट को 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। ध्यान रहे कि छिड़काव करते समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। वैज्ञानिक तरीकों से की गई यह देखभाल निश्चित रूप से किसानों की आय में बढ़ोतरी करेगी।












